Rohit Kumar Shukla

Rohit Kumar Shukla

0 Hits Rohit Kumar Shukla Oct 2, 2026, 12:12 PM Oct 2, 2026, 12:12 PM
सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के अठारहवें साल में कदम रखने की गवाह जो बन रही थी। कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी। "अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!" गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था। ## हंगामा-ए-बरपा गाँव के मुख्य कुएँ के पास, जहाँ सुबह-सुबह औरतें पानी भरने और मर्द दातून करने जुटते थे, वहाँ सन्नाटा पसर गया था। वजह साफ़ थी। कजरी ठीक कुएँ की मुँडेर पर खड़ी थी। कोई सलवार-सूट नहीं, कोई घाघरा-चोली नहीं। वह लाल रंग की ब्रा और काले रंग की पैंटी पहने, भीगे बालों को झटकते हुए खिलखिलाकर हँस रही थी। उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी और बेबाक बदन पर भोर की पहली किरणें ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी संगमरमर की मूरत पर रोशनी पड़ रही हो। > "क्या हुआ चाचा? कभी कोई लड़की नहीं देखी क्या? या इस उम्र में भी दिल धड़कने लगा?" कजरी ने कमर पर हाथ रखकर, आँख मारते हुए रामखिलावन को चिढ़ाया। > गाँव की औरतें अपनी साड़ियों के पल्लू से आँखें मूंदने का नाटक कर रही थीं, लेकिन उंगलियों के बीच की जगह से कजरी को घूर भी रही थीं। कुछ बड़बड़ा रही थीं, "हाय दइया! ये कलयुग नहीं, महाकलयुग है! ऐसी बेशर्म लड़की तो खानदान डुबो देगी।" वहीं, गाँव के जवान लड़के—जो रोज़ सुबह खेतों की तरफ जाने के बहाने ढूंढते थे—आज कुएँ के पास ही जम गए थे। उनकी निगाहें कजरी के इस बिंदास और कातिलाना अंदाज़ पर टिकी थीं। कोई विमल चबाना भूल गया था, तो किसी के हाथ से दातून गिर गई थी। ## बगावत या बस एक शरारत? कजरी के लिए यह कोई अश्लीलता नहीं, बल्कि गाँव के उन ठेकेदारों के मुंह पर एक करारा तमाचा था जो रोज़ उसकी स्कर्ट की लंबाई और कुर्ते के गले को नापते थे। कल ही तो पंचायत ने फैसला सुनाया था कि गाँव की लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी और शाम ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकलेंगी। कजरी ने उसी वक्त ठान लिया था कि वह इस बंदिश की धज्जियां उड़ाकर रहेगी। "कजरी! नीचे उतर, ओ कजरी!" भीड़ को चीरते हुए कजरी की माँ, बिमला देवी, हाथ में एक बड़ी सी चादर लेकर रोती-बिलखती भागती हुई आईं। उनका चेहरा शर्म और डर से लाल था। "नीचे उतर बेटी! लाज रख ले मेरी! तेरे बापू को पता चलेगा तो वो कुएँ में कूद जाएंगे!" बिमला ने चादर कजरी की तरफ फेंकते हुए कहा। कजरी ने हवा में ही चादर को लपक लिया, लेकिन उसे ओढ़ने के बजाय उसने उसे एक महारानी के केप (Cape) की तरह अपनी पीठ पर बांध लिया। वह कुएँ से नीचे कूदी—एकदम हिरणी जैसी फुर्ती के साथ। "माँ, बापू को बोलो कि कुएँ में कूदने की ज़रूरत नहीं है। पानी बहुत ठंडा है, उन्हें जुकाम हो जाएगा!" कजरी ने हँसते हुए अपनी माँ के गाल चूमे। ### पंचायत का बुलावा कजरी का यह 'हंगामा' सिर्फ कुएँ तक सीमित नहीं रहा। दोपहर होते-होते यह खबर पूरे शिवपालपुर और आसपास के तीन गाँवों में आग की तरह फैल गई। स्मार्टफोन के इस दौर में, गाँव के किसी लड़के ने चुपके से कजरी का एक छोटा सा वीडियो बना लिया था, जो अब 'शिवपालपुर की बिजली' नाम से व्हाट्सएप ग्रुप्स में तैर रहा था। शाम को गाँव के बरगद के पेड़ के नीचे एक आपातकालीन पंचायत बुलाई गई। मुखिया गजानन सिंह अपनी मूंछों को ताव देते हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उनके चेहरे पर गंभीर शिकन थी। "सोनू के बापू, तुम्हारी लड़की ने आज जो किया है, उसने हमारे गाँव की पगड़ी को धूल में मिला दिया है। अठारह साल की लड़की, और ऐसे तंग कपड़ों में... छी! राम-राम," मुखिया ने थूकते हुए कहा। कजरी के पिता, रामस्वरूप, सिर झुकाए हाथ जोड़े खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे। लेकिन तभी भीड़ को चीरती हुई कजरी खुद वहाँ आ पहुँची। इस बार उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके चलने का अंदाज़ और आँखों की चमक वही पुरानी थी। > "मुखिया जी! पगड़ी सिर पर होती है, किसी लड़की के कपड़ों में नहीं छिपी होती," कजरी की आवाज़ पूरी पंचायत में गूंज उठी। > सबके मुंह खुले के खुले रह गए। एक अठारह साल की लड़की, जिसके ऊपर पूरा गाँव थू-थू कर रहा था, वह बिना किसी डर के पंचायत के सामने आँखें मिलाकर खड़ी थी। शिवपालपुर के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। कजरी का यह हंगामा सिर्फ कपड़ों का नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सोच के खिलाफ एक ऐसी जंग की शुरुआत थी, जिसे पूरा गाँव आसानी से भूल नहीं पाएगा। --- ## अध्याय: बरगद की छाँव और धड़कते दिल पंचायत की वो तूफानी शाम बीत चुकी थी, लेकिन शिवपालपुर की हवाओं में अभी भी कजरी के नाम की सनसनी घुली हुई थी। गाँव के लोग सोच रहे थे कि कल की डांट और हंगामे के बाद कजरी शायद घर के किसी कोने में दुबक कर रो रही होगी। लेकिन कजरी को समझना गाँव वालों के बस की बात कहाँ थी? वह तो उस बहती नदी की तरह थी, जिसे चट्टानें रोकने की कोशिश करें तो वह अपना रास्ता और ज़्यादा खूंखार या खूबसूरत बना लेती है। अगली सुबह, जब गाँव के ज़्यादातर लोग खेतों की तरफ जा चुके थे, कजरी अपने उसी बेबाक और चुलबुले अंदाज़ में घर से निकल पड़ी। आज फिर उसने समाज के बनाए बंधनों को ठेंगा दिखाते हुए सिर्फ अपनी पसंद के अंतःवस्त्र पहने हुए थे। धूप उसके बदन पर ऐसे खिल रही थी जैसे ताज़े तोड़े गए गुलाब पर ओस की बूंदें चमकती हैं। गाँव के छोर पर बने एक पुराने अस्तबल और भूसे के घर के पास रामू काका खड़े थे। पैंतीस साल के रामू काका गाँव के उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो कजरी को बचपन से जानते थे और उसकी हर नादानी पर डांटने के बजाय हमेशा मुस्कुरा दिया करते थे। मजबूत कद-काठी, चौड़ी छाती और चेहरे पर एक ठहराव—रामू काका का व्यक्तित्व ऐसा था कि कजरी उनके सामने आते ही अपनी सारी शरारतें भूलकर एकदम बच्ची या फिर पूरी तरह एक महबूबा बन जाती थी। ## बाहों का घेरा और पिघलती दूरियाँ कजरी ने दूर से ही रामू काका को देखा। उसके चेहरे पर एक शरारती और बेहद प्यारी मुस्कान तैर गई। वह दबे पाँव, अपनी पायल की आवाज़ को संभालते हुए पीछे से आई और बिना किसी झिझक के, एक ही झटके में रामू काका की मजबूत बाहों में सिमट गई। "अरे! कौन..." रामू काका चौंके, लेकिन जैसे ही उन्होंने उस जानी-पहचानी खुशबू और छुअन को महसूस किया, उनके शब्द गले में ही अटक गए। कजरी ने अपना कोमल, गोल-मटोल सर रामू काका के चौड़े और मजबूत कंधे पर टिका दिया। उसने अपनी घनी पलकों को मूंद लिया, जैसे उसे दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना मिल गया हो। इस अचानक हुए मिलन से दोनों के बदन एक-दूसरे में सिमट गए। कजरी के भरे हुए, गोल-मटोल वक्ष रामू काका के सख्त और तपते हुए सीने से पूरी तरह सट गए, जिससे दोनों के बीच की बची-कुची दूरी भी मिट गई। > रामू काका का दिल एक पल के लिए थम गया और अगले ही पल किसी नगाड़े की तरह धड़कने लगा। उनकी सांसें भारी हो गईं। उन्होंने कजरी को खुद से दूर करने की एक नाकाम कोशिश करनी चाही, लेकिन कजरी के बदन की गर्माहट और उसकी बेबाकी ने उनके इरादों को पिघला दिया। > धीरे-धीरे, अनजाने में ही सही, रामू काका के मजबूत हाथों ने कजरी की पतली और लचीली कमर को अपनी गिरफ्त में ले लिया। उनकी उंगलियों का दबाव कजरी की त्वचा पर महसूस हो रहा था। ## एक खामोश इकरार कमर पर रामू काका की पकड़ मजबूत होते ही कजरी के होंठों पर एक मंद-मंद, रहस्यमयी मुस्कान बिखर गई। उसने अपनी आँखें नहीं खोलीं। वह बस उस छुअन को, उस अहसास को अपने भीतर उतार लेना चाहती थी। पूरा गाँव जहाँ उसे हिकारत और गुस्से से देख रहा था, वहीं रामू काका की ये बाहें उसे एक अजीब सा सुकून और हक दे रही थीं। "कजरी... ये क्या दीवानगी है? कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगा," रामू काका ने बेहद धीमी, लड़खड़ाती आवाज़ में उसके कान के पास कहा। उनकी गर्म सांसें कजरी के गले को छू रही थीं, जिससे कजरी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई। लेकिन कजरी ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उसने धीरे से बुदबुदाया, "देखने दीजिए काका... पूरी दुनिया को देखने दीजिए। मुझे किसी का डर नहीं, जब तक आप मेरे पास हैं।" भूसे के उस बंद कमरे के बाहर पुरवइया हवा चल रही थी, लेकिन अंदर का तापमान कजरी की इस नई शरारत और रामू काका के बढ़ते कदमों के बीच लगातार गरमाता जा रहा था। शिवपालपुर की यह कहानी अब सिर्फ एक बगावत नहीं, बल्कि एक बेहद गहरे और उलझे हुए अहसास की तरफ मुड़ रही थी। --- ## अध्याय: धड़कनों का सरगम रामू काका के भीतर का संयम अब पूरी तरह से जवाब दे चुका था। कजरी की बेबाक छुअन और उसके बदन की खुशबू ने उनके भीतर एक ऐसा सैलाब ला दिया था, जिसे रोक पाना उनके बस में नहीं था। उनके हाथों ने कजरी की पतली कमर को छोड़कर धीरे से उसके कोमल चेहरे को अपने हाथों के घेरे में ले लिया। कजरी ने जैसे ही रामू काका के हाथों की तपिश अपने गालों पर महसूस की, उसकी बंद पलकें हलकी सी कांपीं। उसने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें शरारत की जगह अब एक गहरा समर्पण और नशा था। अगले ही पल, रामू काका ने बिना एक भी शब्द कहे, अपने होंठ कजरी के रसीले होंठों पर टिका दिए। कजरी के होंठों की मिठास और ताजगी ऐसी थी जैसे सावन की पहली बूंदें सूखी धरती पर पड़ी हों। रामू काका पूरी शिद्दत से उसके होंठों का रस पीने लगे। कजरी इस अचानक हुए हमले से जरा भी विचलित नहीं हुई, बल्कि उसके चेहरे पर एक गहरी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने खुद को पूरी तरह से रामू काका के हवाले कर दिया और उन्हें धीरे-धीरे अपने होठों का सारा रस पीने दिया। ## गहराई और समर्पण वक्त जैसे ठहर सा गया था। उस छोटे से कमरे में सिर्फ दोनों की भारी होती सांसों की आवाज़ गूंज रही थी। कुछ पलों के बाद, रामू काका का अकुलाहट भरा प्यार और गहरा हो गया। उन्होंने कजरी के चेहरे को थोड़ा और अपनी तरफ झुकाया और पूरी शिद्दत के साथ कजरी के होठों को चूमने लगे। कजरी ने अपने उसी चुलबुले और अलमस्त अंदाज़ में अपने दोनों हाथ उठाए और रामू काका के घने बालों में उंगलियां फंसा दीं। वह धीरे-धीरे उनके बालों को सहलाने लगी, जैसे वह उन्हें दिलासा दे रही हो कि वह पूरी तरह से उन्हीं की है। रामू काका की गिरफ्त जितनी मजबूत होती जा रही थी, कजरी उतनी ही सहजता से उन्हें अपने करीब आने दे रही थी। > गाँव की पाबंदियां, पंचायत का डर और समाज के नियम... इस एक चूमने के अहसास के सामने सब कुछ धुआँ हो चुके थे। कजरी ने अपनी आँखें फिर से मूंद लीं और रामू काका की बाहों में पिघलती चली गई। > यह मुलाकात अब महज एक शरारत नहीं रह गई थी, बल्कि शिवपालपुर की गलियों से छिपकर शुरू हुई एक ऐसी दास्तान बन चुकी थी, जिसका अंजाम कुछ बहुत बड़ा होने वाला था। --- ## अध्याय : खामोशी की गूंज वक्त जैसे वहीं ठहर गया था। रामू काका ने जब कजरी के होंठों से अपने होंठ धीरे-धीरे अलग किए, तो दोनों की सांसें बुरी तरह धड़क रही थीं। कजरी के लाल रसीले होंठ अब और भी गहरे और भीगे हुए नजर आ रहे थे। कजरी ने अपनी भारी पलकें उठाईं और रामू काका की आँखों में झाँका, जहाँ अब भी एक अजीब सी कशमकश और चाहत का समंदर हिलोरें ले रहा था। कजरी के चेहरे पर अब भी वही चुलबुली और बेबाक मुस्कान कायम थी। उसने अपनी उंगलियों से रामू काका के होंठों पर लगी नमी को धीरे से छुआ और अपनी उंगली को खुद चूम लिया। "काका... अब तो सारा डर मिट गया न?" कजरी ने धीमी और नशीली आवाज़ में पूछा। रामू काका ने कजरी को देखा—लाल और काले अंतःवस्त्रों में लिपटी उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी इस बंद कमरे के अंधेरे में भी चमक रही थी। उन्होंने कजरी के माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से और कसकर सटा लिया। बाहर गाँव का शोर था, पंचायत की पाबंदियाँ थीं और लोक-लाज का डर था, लेकिन इस वक्त भूसे के उस छोटे से ढेरी के पीछे, शिवपालपुर के सारे नियम-कायदे पूरी तरह टूट कर बिखर चुके थे। कजरी जानती थी कि उसने गाँव में जो हंगामा शुरू किया था, उसकी मंजिल अब रामू काका के दिल से होकर गुजरने वाली थी। --- ## अध्याय: समर्पण की एक नई सुबह रामू काका ने कजरी को खुद से कुछ इंच दूर किया। उनकी नजरें अब कजरी के चेहरे से हटकर उसके पूरे वजूद पर तैरने लगीं। उन्होंने कजरी को सिर से लेकर पाँव तक बड़े गौर से देखा। लाल और काले अंतःवस्त्रों में लिपटी कजरी की अठारह साल की अल्हड़ जवानी, उसकी चिकनी कमर, और उसकी आँखों में बिखरी वो बेबाक शरारत—सब कुछ मिलकर एक ऐसा जादुई समां बांध रहे थे, जिसने रामू काका को पूरी तरह अपने वश में कर लिया था। कजरी के बदन का एक-एक कतरा इस समय बगावत और बेबाकी की गवाही दे रहा था। कजरी के कुछ भीगे और घुंघराले बाल उसके गोरे कंधों पर बिखरे हुए थे, जो उसकी खूबसूरती को और उभार रहे थे। रामू काका ने बड़े ही सहेज कर, बेहद कोमलता से अपने कांपते हाथों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कजरी के उन रेशमी बालों को उसके कंधों से धीरे-धीरे हटाया और पीठ की तरफ पीछे कर दिया। इस छुअन से कजरी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और उसने अपनी गर्दन को थोड़ा सा एक तरफ झुका लिया। ## बाहों का अटूट बंधन बालों को पीछे करते ही जैसे सारे पर्दे हट गए। रामू काका ने बिना एक पल भी गंवाए, कजरी को दोबारा पूरी ताकत और शिद्दत के साथ अपनी मजबूत बाहों के घेरे में भर लिया। यह आलिंगन पहले से कहीं ज्यादा गहरा और जज्बाती था। इस बार इसमें सिर्फ एक पुरुष की चाहत नहीं थी, बल्कि कजरी के उस बिंदास और बागी अंदाज़ को पूरी तरह स्वीकार कर लेने का एक खामोश वादा भी था। कजरी का कोमल बदन एक बार फिर रामू काका के चौड़े और सख्त सीने से पूरी तरह चिपक गया। > कजरी ने अपनी दोनों बाहें रामू काका के गले में डाल दीं और अपनी आँखें बंद कर लीं। बाहर पूरी दुनिया, पूरा शिवपालपुर गाँव भले ही कजरी के कपड़ों और उसके अंदाज़ पर थू-थू कर रहा था, लेकिन इस बंद कमरे में, रामू काका की बाहों के भीतर कजरी को अपनी दुनिया का सबसे महफूज़ और मुकम्मल ठिकाना मिल चुका था। > दोनों एक-दूसरे की धड़कनों को साफ सुन सकते थे, जो अब एक ही रफ्तार से धड़क रही थीं। शिवपालपुर की इस चुलबुली और नटखट लड़की ने पूरे गाँव में जो हंगामा मचाया था, उसकी गूँज अब इस शांत कमरे में एक गहरे अहसास में तब्दील हो चुकी थी। --- ## अध्याय: मदहोशी का चरम रामू काका की नज़रें जब कजरी के बदन पर रुकीं, तो उनका सारा आत्मनियंत्रण पूरी तरह बह गया। कजरी की लाल ब्रा से उभरते उसके गोल-मटोल और गदराए हुए दूध साफ़ नजर आ रहे थे। अठारह साल की इस अल्हड़ जवानी का यह हिस्सा रामू काका के सीने की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी था। जब भी कजरी गहरी सांस लेती, उसके दोनों दूध ब्रा के कप्स को फाड़कर बाहर आने को मचलते हुए ऊपर-नीचे होते। कजरी ने रामू काका की आँखों में उमड़ती उस तीव्र चाहत को भाँप लिया। वह अपनी उसी नटखट और बिंदास अदा के साथ और करीब आई। उसने रामू काका का हाथ पकड़ा और धीरे से उसे अपनी लाल ब्रा के ऊपर, अपने उभरे हुए दूध पर रख दिया। > रामू काका के मजबूत हाथ की हथेलियों में कजरी के गोरे और सुडौल दूध पूरी तरह समा गए। उनकी उंगलियों ने जैसे ही उस कड़कती जवानी के उभारों को भींचा, कजरी के मुंह से एक हल्की सी सिसकारी निकल गई। > "काका... पूरे गाँव में सिर्फ आप ही हो जो मुझे सच में समझ सकते हो," कजरी ने आँखें बंद करके बेहद मदहोश आवाज़ में कहा। रामू काका ने अब कजरी को और ज़ोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया। लाल ब्रा और काली पैंटी में लिपटी कजरी का पूरा बदन रामू काका की छाती और जांघों से पूरी तरह चिपक गया। कजरी के गोल दूध एक बार फिर रामू काका के सख्त सीने पर पिचक गए, जिससे दोनों के शरीरों के बीच की गर्मी और भी बढ़ गई। इस बंद और शांत कमरे में अब सिर्फ कजरी की चुलबुली सिसकियाँ और रामू काका की भारी होती सांसों का शोर गूंज रहा था। --- ## अध्याय: शरारत और विदाई कजरी की इस बेबाक मदहोशी और बढ़ती नजदीकियों के बीच रामू काका अचानक अपनी पुरानी मस्ती भरे अंदाज़ में लौट आए। उन्हें समझ आ गया था कि अगर वह इस वक्त खुद पर काबू नहीं रखेंगे, तो बात बहुत आगे बढ़ जाएगी। कजरी की इस चुलबुली दीवानगी का जवाब उन्होंने उसी के अंदाज़ में देने का फैसला किया। रामू काका ने कजरी की पतली कमर पर जमी अपनी पकड़ को थोड़ा ढीला किया और अपने दाहिने हाथ को नीचे ले जाते हुए, काली पैंटी में लिपटे कजरी के गोल और गदराए चूतड़ों पर 'चट' से एक ज़ोरदार चपत लगा दी। "चल हट नटखट! बहुत बदमाशी हो गई आज के लिए," रामू काका ने हँसते हुए बनावटी गुस्से से कहा। चपत की उस हल्की सी थरथराहट और आवाज़ ने कजरी को एक पल के लिए चौंकाया, लेकिन अगले ही पल वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसके चूतड़ों पर रामू काका के हाथ का गरम निशान छप चुका था। कजरी ने अपनी पैंटी को थोड़ा सीधा किया, अपनी ब्रा के स्ट्रैप को संभाला और रामू काका को एक आखिरी कातिलाना आँख मारी। > "ठीक है काका, आज के लिए इतना ही! बाकी का हंगामा कल के लिए बचा कर रखते हैं," कजरी ने मटकते हुए कहा। वह अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में, अपनी पायल की छनक बिखेरती हुई, भूसे के कमरे से बाहर निकल गई। धूप में चमकता उसका बदन और उसकी बेबाक चाल एक बार फिर शिवपालपुर की गलियों में नया तूफान उठाने के लिए तैयार थी, और रामू काका वहीं खड़े बस मुस्कुराते हुए उसे जाते देख रहे थे। --- ## अध्याय: बारात का स्वागत और कजरी का तमाशा गाँव के दूसरे छोर पर, बड़े से मैदान में शाम को आने वाली बारात की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से चल रही थीं। बड़े-बड़े तंबू तन चुके थे, रंग-बिरंगी झालरें हवा में लहरा रही थीं और दूर से ही कड़ाही में छनती हुई गरमा-गरम पूड़ियों और उबलती चाशनी की महक पूरे वातावरण में घुली हुई थी। दर्जनों हलवाई अपनी-अपनी कड़ाही संभाले, पसीना बहाते हुए मिठाइयाँ और पकवान तैयार करने में जुटे थे। पूरा गाँव वहाँ किसी न किसी काम से इकट्ठा था। तभी, बारात के इस शोर-शराबे के बीच अचानक सन्नाटा पसर गया और सबका ध्यान मैदान के प्रवेश द्वार की तरफ चला गया। कजरी, अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में, बिना किसी झिझक के मैदान में दाखिल हो चुकी थी। कल की पंचायत की डांट या रामू काका की चपत का उस पर रत्ती भर भी असर नहीं हुआ था। उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी धूप में साफ चमक रही थी। लेकिन आज उसका अंदाज़ कुछ और ही ज़्यादा शरारती था। ## स्टॉल का मुआइना और घोड़ी का अंदाज़ कजरी सीधे उन फूड स्टॉल्स की तरफ बढ़ी जहाँ हलवाइयों ने चाट, गोलगप्पे और मिठाइयों के काउंटर सजाए थे। वह हर एक स्टॉल के सामने जाकर सीधे खड़े होने के बजाय, अपने चुलबुले अंदाज़ में एक घोड़ी की तरह आगे की तरफ झुक जाती। जब वह झुकती, तो उसकी काली पैंटी में लिपटे उसके गोल और गदराए चूतड़ पीछे की तरफ हवा में उठ जाते और उसकी लाल ब्रा से उसके भारी दूध नीचे की ओर लटक जाते। इस पूरी तरह से झुकी हुई पोजीशन में, वह अपनी आँखें मटकाते हुए हर एक कड़ाही और थाल का मुआइना कर रही थी, मानो वह बारात के खाने की मुख्य चाट-निरीक्षक हो। > "अरे ओ प्रधान जी के हलवाई! रसगुल्ले ठीक से स्पंजी बने हैं या सिर्फ चाशनी भर दी है?" कजरी ने एक स्टॉल पर पूरी तरह झुककर, रसगुल्लों के परात को सूंघते हुए पूछा। ## गाँव का ठहाका कजरी का यह अजीबोगरीब और बेबाक रूप देखकर वहाँ मौजूद हलवाई, गाँव के युवा और बुजुर्ग अपनी हंसी नहीं रोक पाए। जहाँ कुछ बुजुर्गों ने अपनी आँखें फेर लीं, वहीं मैदान में ठहाकों का एक सैलाब उमड़ पड़ा। "अरे कजरी बिटिया! अगर बारात आने तक तुम ऐसे ही मुआइना करती रहीं, तो दूल्हा घोड़ी पर बैठकर नहीं, तुम्हें ही देखकर बेहोश हो जाएगा!" एक बूढ़े हलवाई ने कड़ाही चलाते हुए ज़ोर से हंसकर कहा। आसपास खड़े लड़के कजरी के चूतड़ों के इस उभार और उसकी ब्रा से झांकती जवानी को देखकर मन ही मन मचल रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से हंसकर तालियाँ बजा रहे थे। कजरी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कौन उसकी जवानी को देख रहा है और कौन हँस रहा है। वह तो बस अपनी मस्ती में डूबी, हर स्टॉल पर जा-जाकर अपनी कमर लचकाती और घोड़ी की तरह झुककर खाने का स्वाद सूंघती रही। शिवपालपुर की इस बारात में दूल्हे के आने से पहले ही कजरी ने अपना असली हंगामा शुरू कर दिया था। --- ## अध्याय: जलेबी की मिठास और करारा स्वाद मैदान में ठहाकों का दौर अभी थमा भी नहीं था कि कजरी ने एक और नया तमाशा शुरू कर दिया। वह मटकती हुई सीधे उस स्टॉल के पास पहुँची जहाँ गरमा-गरम, रसीली जलेबियाँ छनकर चाशनी के कुंडे में डूब रही थीं। कड़ाही से उठती भाप और केशर की खुशबू ने कजरी को अपनी तरफ खींच लिया था। अपने उसी चिर-परिचित चुलबुले और नटखट अंदाज़ में, कजरी जलेबी के थाल के ठीक सामने एक बार फिर घोड़ी की तरह आगे झुक गई। जब वह झुकी, तो उसकी लाल ब्रा में बंधे उसके दोनों भारी दूध नीचे लटक गए और उसकी काली पैंटी में तने उसके गोल-मटोल चूतड़ पीछे की तरफ हवा में पूरी तरह उभर आए। वहाँ मौजूद हर शख्स की निगाहें एक बार फिर उसके बदन के इस कातिलाना उभार पर टिक गईं। कजरी ने प्लेट में रखी एक बड़ी सी, चाशनी से सराबोर जलेबी को उठाया नहीं, बल्कि झुके-झुके ही अपनी गुलाबी जीभ बाहर निकाली। उसने बेहद मदहोश अंदाज़ में जलेबी के ऊपर जमी चाशनी को अपनी जीभ से धीरे-धीरे चाटना शुरू कर दिया। > "उफ्फ... कितना मीठा है!" कजरी ने अपनी आँखें आधी बंद करते हुए, रसीली आवाज़ में सिसकारी भरी। > ## हलवाई की चपत और तंज हलवाई—जो कि पास के ही गाँव का था और कजरी के इस रोज़-रोज़ के ड्रामे से अच्छी तरह वाकिफ था—उससे अब रहा नहीं गया। कजरी जिस अंदाज़ में उसके सामने अपने चूतड़ उचकाए खड़ी थी, उसने हलवाई के हाथ की खुजली बढ़ा दी। उसने कड़ाही से अपनी बड़ी छननी निकाली, उसे एक तरफ रखा और अपने चाशनी से सने मजबूत हाथ को हवा में लहराया। **'चटाक!'** हलवाई ने कजरी के काली पैंटी में कसे हुए गदराए चूतड़ों पर एक ज़ोरदार और करारी चपत जड़ दी। चपत इतनी ज़ोर की थी कि कजरी के चूतड़ों का मांस एक पल के लिए काँप उठा और उस पर हलवाई की उंगलियों का गर्म निशान छप गया। "धत् तेरे की! भाग यहाँ से पागल लड़की!" हलवाई ने हंसते हुए और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "जलेबी मीठी ही होती है, कड़वी नहीं! और यहाँ अपना ये मुआइना बंद कर, वरना बारात आने से पहले ही सारा खाना ठंडा हो जाएगा।" चपत लगते ही कजरी झटके से सीधी खड़ी हो गई। उसने अपने हाथ से अपने चूतड़ को सहलाया, जहाँ अब हल्की सी जलन और गुदगुदी हो रही थी। दर्द होने के बजाय कजरी के चेहरे पर एक और गहरी शरारती मुस्कान आ गई। उसने हलवाई को जीभ चिढ़ाई, अपनी पैंटी को थोड़ा सा ऊपर खींचा और हंसती हुई अगले स्टॉल की तरफ बढ़ गई। मैदान में खड़ा हर इंसान अब कजरी की इस नई नादानी पर लोट-पोट हो रहा था। --- ## अध्याय: समोसे का तीखा स्वाद और गरम चिमटा जलेबी वाले की करारी चपत खाकर और उसे अपनी गुलाबी जीभ चिढ़ाकर कजरी आगे बढ़ गई। हलवाई की दुकान पर लगे ठहाकों की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि कजरी अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में मटकती हुई समोसे के स्टॉल की तरफ बढ़ चली। हवा में छनते हुए आलू और मसालों की तीखी, चटपटी खुशबू ने कजरी के कदम अपनी ओर खींच लिए थे। समोसे वाले ने अभी-अभी कड़ाही से खस्ता, तिकोने और खौलते हुए गरम समोसे निकालकर परात में सजाए ही थे। कजरी ठीक परात के सामने जाकर रुकी और एक बार फिर अपने चिर-परिचित चुलबुले अंदाज़ में आगे की तरफ एक घोड़ी की तरह झुक गई।
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Oct 2, 2026, 12:12 PM Rohit Kumar Shukla